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विभागीय जाँच (DEPARTMENTAL ENQUIRY )

सरकारी सेवा, नियुक्तियाँ व सेवाशर्तें

अध्याय- एक ( CHAPTER 1)

सरकारी सेवा, नियुक्तियाँ व सेवाशर्तें ( GOVERNMENT SERVICE , APPOINTMENTS AND SERVICE RULES )

सरकारी सेवकों को, दुराचरण, कर्तव्य के प्रति उपेक्षा, अक्षमता आदि के लिए, विभागीय स्तर पर दण्डित करने से पूर्व तत्सम्बन्धी “नियत प्रक्रिया” का अनुपालन करना अनिवार्य है। यह नियत प्रक्रिया “विभागीय जाँच” कहलाती है। परन्तु कुछ मामलों में पद के लिए अयोग्यता के आधार पर, या लोकहित में, सरकारी सेवकों की सेवा समाप्त करनी होती है तथा इसका विनिश्चय करने से पूर्व सशक्त प्राधिकारी जाँच करते हैं, जो उक्त चर्चित विभागीय जाँच से स्पष्टतः और पूर्णतः भिन्न है। इस विभेद को समझने के लिए सरकारी सेवा एवं नियुक्तियों की प्रकृति, पद धारण करने के अधिकार एवं अनिवार्य सेवा शर्तों का ज्ञान होना आवश्यक है।

किसी भी देश अथवा राज्य की शासन प्रणाली में सिविल सेवाओं का होना अपरिहार्य है। यद्यपि लोकतंत्रात्मक राष्ट्र में राज्य की नीतियों का निर्धारण जन प्रतिनिधियों अर्थात मंत्रियों या मन्त्रिमण्डलों द्वारा किया जाता है, परन्तु उन नीतियों के क्रियान्वयन हेतु सिविल सेवाओं का होना परम् आवश्यक है। राज्य की नीतियों का क्रियान्वयन केवल अनुशासनबद्ध, योग्य एवं चरित्रवान सिविल सेवकों द्वारा ही सम्भव है। सिविल सेवा (सरकारी सेवा) का अर्थ सशस्त्र सेना की सेवाओं को छोड़‌कर ऐसी सेवाओं से है, जो राज्य के प्रति समर्पित हो पर्व उसके वेतन का भुगतान राज्य द्वारा किया जाता हो।

सरकारी सेवा (सिविल सेवा) तथा निजी (प्राइवेट) सेवा के बीच मूलभूत अंतर है। निजी (प्राइवेट) सेवा पूर्णतः संविदा पर आधारित होती है। नियोजक एवं कर्मकार के बीच “मालिक-सेवक” का संबंध होता है और यह सम्बन्ध सम्पूर्ण सेवावधि के दौरान बना रहता है। प्राइवेट सेवकों के अधिकार पर्व दायित्व उभय पक्षों की सहमति के आधार पर अवधारित होते हैं।

इसके विपरीत सरकारी सेवा, यद्यपि आरम्भ में संविदा पर आधारित होती है, तथापि सेवा में नियोजित हो जाने के उपरान्त यह “प्रास्थिति” स्टेटस का विषय हो जाता है। प्रत्येक सरकारी-सेवा के मामले में शासन का प्रस्ताव होता है, जिसका प्रतिग्रहण अभ्यर्थीगण द्वारा किया जाता है, अतः सरकारी सेवा की शुरुआत संविदा पर आधारित होती है परन्तु जैसे ही वह अभ्यर्थी सरकारी सेवा में किसी पद पर नियुक्त कर दिया जाता है, वैसे ही यह सेवा में एक “प्रास्थिति” अर्जित कर लेता है।

विधि-शास्त्र के शब्दों में “प्रास्थिति” एक ऐसे समुदाय की सदस्यता की शर्त है जिसके सदस्यों की शक्तियाँ और कर्तव्य, पक्षों की संविदा द्वारा नही अपितु कानून द्वारा अभिनिर्धारित होते हैं। सरकारी सेवकों के अधिकार एवं दायित्व उभय पक्षों की सहमति द्वारा अभिनिर्धारित नहीं होते हैं, बल्कि कानून एवं नियमावलियों द्वारा अभिनिर्धारित होते हैं, जिन्हें शासन दारा एकपक्षीय रूप से विरचित एवं परिवर्तित किया जा सकता है। अतः सरकारी सेवा कर विशिष्ट लक्षण “प्रास्थिति” है तथा सरकारी सेवक की विधिक स्थिति “संविदा” के स्थान पर “प्रस्थिति” पर आधारित होती है।

सरकारी सेवक

सरकारी सेवक की सर्वमान्य परिभाषा कहीं नही दी गई है। विभिन्न सेवा नियमावलियों में सरकारी सेवक को परिभाषित किया गया है। लेकिन यह परिभाषा सम्बन्धित नियमावली के संदर्भ में ही लागू होती है। भारत के संविधान में भी सरकारी सेवक को परिभाषित नहीं किया गया है, परन्तु अनुच्छेद 310 के अवलोकन से यह स्पष्ट है कि सरकारी सेवक का अर्थ-

  1. भारत संघ के सिविल सेवा (सरकारी सेवा) के सदस्यों से है, या
  2. अखिल भारतीय सिविल सेवा (सरकारी सेवा) के सदस्यों से है, या
  3. राज्य की सिविल सेवा (सरकारी सेवा) के सदस्यों से है, या
  4. भारत संघ या राज्य के अधीन सेवा के पदधारकों से है, या
  5. भारत संघ की रक्षा सेवा के सदस्यों से है, या
  6. रक्षा से सम्बन्धित किसी पद को धारण करने वाले व्यक्ति से है।

सेंट्रल सिविल सर्विसेज ( क्लासिफिकेशन ,कंट्रोल एण्ड अपील ) रूल्स, 1965 के नियम 2 ( एच )में इस नियमावती के प्रयोजन हेतु “सरकारी सेवक” की परिभाषा दी हुई है। जिसके अनुसार सरकारी सेवक का अर्थ ऐसे व्यक्ति से है-

1- जो भारतीय संघ की सेवा का सदस्य हो, या संघ के अधीन सिविल पद धारण करता हो। उसमें वे सभी व्यक्ति सम्मिलित है, जो बाह्य सेवा में हो अथवा जिनकी सेवाएं अस्थायी रूप से राज्य सरकार या अन्य स्थानीय प्राधिकारी के नियंत्रणाधीन कर दी गयी हो।

2- जो राज्य सरकार की सेवा का सदस्य हो या राज्य के अधीन सिविल पद धारण करता हो एवं उसकी सेवाएं अस्थायी रूप से केन्द्र सरकार के नियन्त्रणाधीन कर दी गयी हो।

3- जो स्थानीय अथवा अन्य प्राधिकारी की सेवा में हो एवं उसकी सेवाएं अस्थायी रूप से केन्द्र सरकार के नियंत्रणाधीन कर दी गई हों।

उत्तर प्रदेश मूल नियमावली, 1942 के नियम 9 (7- ख) में, इस नियमावली के प्रयोजन हेतु सरकारी सेवक को परिभाषित किया गया है, जिसके अनुसार सरकारी सेवक का तात्पर्य उन व्यक्तियों से है जो भारतीय गणतंत्र में किसी सिविल पद पर अथवा सिविल सेवा में नियुक्त हों तथा उत्तर प्रदेश के शासकीय कार्यों के संचालन के संबंध में सेवा कर रहे हों और उनकी सेवा शर्ते राज्यपाल द्वारा निर्धारित की गई हो अथवा की जा सकती हो।

अतः किसी भी देश या प्रदेश की सिविल एवं रक्षा सेवाओं के सदस्यों को सरकारी सेवक कहा जा सकता है।

सरकारी सेवा

सरकारी सेवा में सिविल सेवा पर्व रक्षा सेवा, दोनों ही, सम्मिलित है। सिविल सेवा का तात्पर्य राज्य की सिविल प्रशासन की सेवाओं से है। रक्षा सेवाओं का तात्पर्य देश की सुरक्षा से संबंधित सेवाओं से है। अतः प्रत्येक सिविल सेवा तो सरकारी सेवा होती है परन्तु यह आवश्यक नही है कि प्रत्येक सरकारी सेवा, सिविल सेवा हो।

प्रत्येक सरकारी सेवा का एक संवर्ग होता है। संवर्ग ( कैडर ) का अर्थ उस सेवा के संपूर्ण पदों की संख्या से हे अथवा किसी सेवा के एक भाग के, जो अलग इकाई के रूप में स्वीकृत हो, पदों की कुल संख्या से है।

पदों का वर्गीकरण

सरकारी सेवा में नियुक्तियों हेतु पदों को मुख्यतः दो वर्गो में विभक्त किया जा सकता है:-

  1. स्थायी पद
  2. अस्थायी पद

वित्तीय हस्त पुस्तिका खण्ड-2, भाग 2-4, में उ०प्र० मूल नियमावली, 1942 दी हुई है, जो भाग 2 में अंतर्विष्ट है। इस नियमावली के मूल नियम 9 में परिभाषाएं दी हुई हैं।

“स्थायी पद” की परिभाषा मूल नियम 9(22) में दी हुई है, जिसके अनुसार स्थायी पद का तात्पर्य ऐसे पद से है, जिसके वेतन की एक निश्चित दर, समय की सीमा लगाए बगैर, स्वीकृत की गई हो।

मूल नियम 9(3) में अस्थाई पद को परिभाषित किया गया है, जिसके अनुसार “अस्थायी पद” का तात्पर्य ऐसे पद से है, जिसके वेतन की एक निश्चित दर, एक सीमित समय के लिए स्वीकृत की गई हो।

सरकारी सेवा में किसी व्यक्ति की नियुक्ति, स्थायी अधवा अस्थायी पद पर, निम्नलिखित में से किसी एक प्रकार की हो सकती हैं –

  • अधिष्ठायी (सब्सेंटिव), या
  • परिवीक्षा पर, या
  • स्थानापन्न ।

स्थायी पद पर अधिष्ठायी नियुक्ति से संबंधित सेवक को उस पद पर बने रहने का वास्तविक अधिकार प्राप्त हो जाता है जिसे धारणा-धिकार कहते हैं।

स्थायी पद पर परिवीक्षाधीन नियुक्ति का अर्थ यह है कि उस सरकारी सेवक को परीक्षण पर सेवा में लिया गया है। परिवीक्षाकाल, एक नियत अवधि के लिए हो सकता है अथवा अनिर्धारित भी हो सकता है। इस प्रकार की नियुक्ति में किसी प्रकार का धारणाधिकार संबंधित सरकारी सेवक को प्राप्त नहीं होता है।

“स्थानापन्न” की परिभाषा मूल नियम 9(19) में दी हुई है जिसके अनुसार, जब कोई सरकारी सेवक ऐसे पद के कर्तव्यों का निष्पादन करे जिस पद पर किसी अन्य व्यक्ति का धारणाधिकार हो तब उस सरकारी सेवक को उस पद पर स्थानापन्न रूप से नियुक्त हुआ कहा जाएगा। शासन, यदि चाहे तो, किसी सरकारी सेवक को ऐसे रिक्त पद पर, जिस पर किसी अन्य सरकारी सेवक का धारणाधिकार न हो, स्थानापन्न रूप से नियुक्त कर सकता है। स्थानापन्न नियुक्ति से सरकारी सेवक को कोई धारणाधिकार प्राप्त नहीं होता।

अतः स्थायी पद पर अधिष्ठायी नियुक्ति की दशा में ही संबंधित सरकारी सेवक को धारणाधिकार प्राप्त होता है। परिवीक्षा पर या स्थानापन्न नियुक्ति की दशा में संबंधित सरकारी सेवक को धारणाधिकार प्राप्त नहीं होता है, भले ही वह पद स्थायी हो। ऐसे नियुक्तियों की यह अंतर्निहित शर्त होती है कि वे किसी भी समय समाप्त की जा सकती है।

स्थायी पद पर किसी सरकारी सेवक की नियुक्ति यदि अस्थायी रूप से की गई हो अर्थात् अग्रिम आदेश तक के लिए की गई हो तो उस दशा में सेवक की वही स्थिति होगी जो स्थानापन्न रूप से नियुक्त सेवक की होती है।

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि स्थायी पद पर अधिष्ठायी नियुक्ति से संबंधित सेवक को उस पद को तब तक धारण किए रहने का अधिकार प्राप्त हो जाता है जब तक कि-

  1. वह नियमों के अन्तर्गत सेवानिवृत्ति की आयु प्राप्त न कर तेवे, अथवा
  2. वह नियत सेवावधि पूरी करने के उपरांत वैवश्यक सेवानिवृत्त न कर दिया जाए, अधवा
  3. उस पद को ही समाप्त न कर दिया जाए, अथवा
  4. उसे दुराचरण के लिए दण्डित करके सेवा-समाप्त न कर दी जाए।

अस्थायी पद पर किसी “नियत अवधि” तक के लिए नियुक्त सरकारी सेवक को उस सम्पूर्ण नियत अवधि के लिए पद धारण करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है एवं उस “नियत अवधि” के दौरान, उसकी सेवा समाप्त नहीं की जा सकती है। परंतु इस नियत अवधि के दौरान यदि वह दुराचरण के लिये दोषी पाया जाए तो दंडस्वरूप उसकी सेवा समाप्त की जा सकती है।

उपरोक्त दोनों प्रकार के मामलों को छोड़ कर अन्य सभी नियुक्तियों में, चाहे वे स्थायी पद पर हो या अथायी पद पर हों, परिवीक्षा पर हो अथवा स्थानापन्न रूप से की गई हो, सम्बन्धित सेवक को पद धारण किए रहने का अधिकार प्राप्त नहीं होता है। अस्थायी पद पर अधिष्ठायी नियुक्ति से भी सम्बन्धित सेवक को पद धारण किए रहने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं होता है। अस्थायी सेवक जब तक अपने पद पर पुष्ट न कर दिए जाएं उन्हें उस पद का धारणाधिकार प्राप्त नहीं होता।(उत्तर-प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम बनाम उत्तर प्रदेश लोक सेवा अधिकरण,1990(60)

सरकारी सेवा में किसी स्थायी पद पर, अधिष्ठायी रूप से किसी स्थायी पद पर अधिष्ठायी रूप से नियुक्त सरकारी सेवक के धारणाधिकार को निम्नलिखित परिस्थितियों में निलम्बित कर सकती है:-

  1. यदि वह सरकारी सेवक भारत से बाहर प्रतिनियुक्ति पर चला जावे, या
  2. यदि वह सरकारी सेवक वाढ्य सेवा में स्थानान्तरित कर दिया जावे, या
  3. यदि सरकारी सेवक को, ऐसी परिस्थितियों में जो उक्त चर्चित नियम 14(ए ) के अन्तर्गत न आती हो, दूसरे संवर्ग के किसी पद पर अधिष्ठायी या स्थानापन्न रूप से स्थानान्तरित कर दिया जावे, या
  4. यदि इनमें से किसी भी मामले में यह विश्वास करने का कारण हो कि वह सरकारी सेवक उस पद से जिस पर उसका धारणाधिकार है, कम-से-कम तीन वर्ष की अवधि तक अनुपस्थित रहेगा।

मूल नियम 14 (बी ) के अंतर्गत निलम्बित धारणाधिकार, निम्नलिखित परिस्थितियों में पुनर्जीवित हो जाएगा(मूल नियम 14 (ऍफ़ ):-

  1. जैसे ही उस सेवक की भारत से बाहर प्रतिनियुक्ति समाप्त हो जाए, या
  2. जैसे ही उस सेवक की बाह्य सेवा समाप्त हो जाए, या
  3. जैसे ही वह सेवक दूसरे सेवा संवर्ग का पद छोड़ देवे, परन्तु प्रतिबन्ध यह है कि निलम्बित धारणाधिकार सरकारी सेवक के अवकाश लेने के कारण पुनर्जीवित नहीं होगा, यदि यह विश्वास करने का कारण हो कि अवकाश से वापस आने पर यह सेवक भारत से बाहर प्रतिनियुक्ति पर बना रहेगा या बाह्य सेवा में बना रहेगा या अन्य सेवा संवर्ग में पद धारण किये रहेगा एवं ड्यूटी से उसकी अनुपस्थिति की अवधि तीन वर्ष से अनत्प नहीं होगी या वह सरकारी सेवक उपनियम के उक्त चर्चित पदों की प्रकृति का कोई पद अधिष्ठायी रूप से धारण किये रहेगा।

इस नियम से सम्बन्धित राज्यपाल के आदेश द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि अपने सेवा संवर्ग से बाहर स्थानान्तरित होने वाला सरकारी सेवक यदि तीन वर्ष के अंदर ही सेवानिवृत्त होने वाला हो तो स्थायी पद पर उसका धारणाधिकार निलम्बित नहीं किया जा सकता।

नियम 14 के उप नियम ॥ए ॥ एवं (बी) के उक्त चर्चित अन्यथा उपबन्धों के होते हुए भी, सर्वाधिक पद पर सरकारी सेवक का धारणाधिकार किसी भी परिस्थिति में निलम्बित नहीं किया जा सकता है। यदि सरकारी सेवक किसी अन्य स्थायी पद पर अधिष्ठायी रूप से नियुक्त किया जाता है तो सर्वाधिक पद पर उसका धारणाधिकार अवश्य ही समाप्त हो जाएगा।(मूल नियम 14 (सी )

यदि किसी सरकारी सेवक का धारणाधिकार नियम 14 के उक्त चर्चित उप-नियम (ए ) या (बी) के अंतर्गत निलम्बित किया गया हो तो उस पद पर अधिष्ठायी नियुक्ति की जा सकती है तथा उस पर नियुक्त सरकारी सेवक उस पद पर धारणाधिकार अर्जित करेगा। परन्तु निलम्बित धारणाधिकार के पुनर्जीवित होते ही यह व्यवस्था उलट जाएगी।( नियम 14 (डी ) यदि संबंधित पद, संवर्ग के चयन श्रेणी (सलेक्शन ग्रेड ) का पद हो तब भी यह प्रावधान लागू होगा।(मूल नियम 14 (डी ) का नोट (1 ).

इस प्रावधान के अंतर्गत किसी पद पर अधिष्ठायी रूप से की गई नियुक्ति को अनंतिम नियुक्ति ( प्रोविजनल ऐपोइन्टमेण्ट ) कहा जाएगा, तथा इस प्रकार नियुक्त सरकारी सेवक का उस पद पर अनंतिम धारणाधिकार बना रहेगा जो उप नियम ॥ए ॥ के अंतर्गत निलम्बित किया जा सकेगा, उप नियम (बी) के अंतर्गत नहीं। (मूल नियम 14 (डी ) का नोट (2 ).

धारणाधिकार की समाप्ति

किसी सरकारी सेवक के पद का धारणाधिकार, उसकी सहमति होते हुए भी, किसी भी परिस्थिति में समाप्त नहीं किया जा सकता है , यदि परिणाम यह होवे कि वह सरकारी सेवक स्थायी पद पर बगैर किसी धारणाधिकार या निलंबित धारणाधिकार के रह जावे। (मूल नियम १४ -ए (ए )).

सेवा संवर्ग से बाहर किसी स्थायी पद पर अधिष्ठायी नियुक्ति के कारण सरकारी सेवक का निलंबित धारणाधिकार, जब वह सरकारी सेवक सेवा में बना रहा है, समाप्त नहीं किया जा सकता। परन्तु यदि वह सरकारी सेवक लिखित प्रार्थना पत्र दे तो निलम्बित धारणाधिकार समाप्त किया जा सकता है।(मूल नियम १४ -ए (बी ))

धारणाधिकार का अंतरण

सरकारी सेवक का स्थानान्तरण एक पद से दूसरे पद पर करने संबंधी प्रावधान मूल नियम 15 में दिए हुए है। स्थानान्तरण के इस प्रावधान के अधीन, यदि कोई सरकारी सेवक अपने उस पद की ड्यूटी नहीं कर रहा हो जिस पर उसे धारणाधिकार प्राप्त हो तो शासन उस धारणाधिकार को, एक ही संवर्ग में एक से दूसरे स्थायी पद पर, अंतरित कर सकता है, भले ही धारणाधिकार निलम्बित कर दिया गया हो। (मूल नियम १४ -बी )

महत्वपूर्ण सेवा शर्तें

उत्तर प्रदेश मूल नियमावली के तीसरे अध्याय में सेवा की सामान्य शर्ते दी हुई है, जिनमें से कुछ महत्वपूर्ण सेवा शर्ते निम्नलिखित है :-

  1. सरकारी सेवक का संपूर्ण समय, शासन के अधीन रहता है। सक्षम प्राधिकारी द्वारा सरकारी सेवक को किसी प्रकार की सेवा में लगाया जा सकता है। तथा उसके लिए यह सेवक किसी अतिरिक्त पारिश्रमिक दावा नहीं कर सकता।(मूल नियम 11 ).
  2. सरकारी सेवक कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से अपने पद की अवधि पर सम्बन्ध वेतन एवं भत्तों को पाने लगेगा और जैसे ही यह उस पद के कर्तव्यों से उन्मुक्त हो जावे वैसे ही वेतन पर्व भत्तों का पाना भी समाप्त हो जाएगा।(मूल नियम १७-(1 )
  3. भारत में बाह्य सेवा के अतिरिक्त, सामान्यतः यदि कोई सरकारी सेवक लगातार पाँच वर्षों तक अनुपस्थित रहा हो, चाहे अवकाश पर रहते हुए या बिना अवकाश के, तब उसकी सरकारी सेवा समाप्त हो जाएगी। परन्तु शासन किसी मामले की विशेष परिस्थितियों को दृष्टिगत करके इस सामान्य उपधारणा के विपरीत विनिश्चय कर सकता है। (मूल नियम 18 ) अथार्त यदि सरकारी सेवक लगातार पाँच वर्षों तक अनुपस्थित रहा हो तो उसकी सेवा समाप्त मानी जाएगी। इसके दो अपवाद हैं:-
  1. यदि वह सरकारी सेवक भारत में ही किसी बाह्य सेवा में कार्यरत हो,
  2. यदि शासन किसी मामले की विशेष परिस्थितियों को दृष्टिगत करके उक्त वर्चित सामान्य नियम के विपरीत अवधारणा करे।

जय शंकर बनाम राजस्थान राज्य के मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि ऐसे मामले में सरकारी सेवक की सेवा स्वतः समाप्त नहीं मानी जाएगी, बल्कि उस सेवक को अपनी अनुपस्थिति का कारण बताने का अवसर दिया जाएगा। अवसर दिए बगैर सेवा समाप्त करना अनुचित एवं अवैध होगा।

4 – वित्तीय हस्त पुस्तिका खण्ड 2, भाग 2-4 के तीसरे भाग में सहायक नियम दिए हुए है। मूल नियम 85 तथा सहायक नियम 157-ए (4)(ए) के अंतर्गत सरकारी सेवक को असाधारण अवकाश स्वीकृत किया जा सकता है। सहायक नियम 157-ए (4)(फ )(4 ) के अंतर्गत अधिकतम 36 माह का असाधारण अवकाश अनुमन्य है।

5 – यदि कोई सरकारी सेवक असाधारण अवकाश की अधिकतम अवधि समाप्त होने पर भी ड्यूटी पर नहीं आता तो यह माना जाएगा कि उसने अपना पद त्याग दिया है और तदनुरूप उसकी सरकारी सेवा समाप्त हो जाएगी। परन्तु राज्यपाल किसी मामले की विशेष परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए अन्यथा विनिश्चय कर सकते हैं।( सहायक नियम 157-ए (4)(ब ) )

बी०एम० त्रिपाठी बनाम उ०प्र० राज्य, के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि सरकारी सेवक की सेवा यह कह कर समाप्त करना कि यह जानबूझकर ड्यूटी से अनुपस्थित रहा, उसे कलंकित करना है, क्योंकि इस कथन से यह प्रतीत होता है कि वह एक गैर जिम्मेदार व्यक्ति है, जिसे कर्तव्य का कोई मान नहीं है।

अतः सहायक निमय 157-ए के अधीन सरकारी सेवक की सेवा समाप्त करना एक दण्ड है तथा यह सुप्रतिष्ठित विधि है कि यदि किसी विशिष्ट गलती के लिए सरकारी सेवक की सेवा दण्डस्वरूप समाप्त की जानी हो तो उसे सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है, भले ही यह सेवक अस्थायी हो। सरकारी सेवक को सुनवाई का अवसर देने से यह कहकर इंकार नहीं किया जा सकता है कि सेवा नियमों के अधीन सरकारी सेवक ने स्वयं ही पद त्याग दिया है।

पुत्तु लाल मिश्र बनाम मारत संघ, के मामले में श्री मिश्र आर्डिनन्स पैराशूट फैक्ट्री कानपुर में टिकट शार्टर थे । अक्टूबर, 1967 में बीमारी के कारण वह अपने गाँव चले गये तथा अपने रिश्तेदार श्री बी बी एस. शुक्ल के जरिए अवकाश प्रार्थना-पत्र भेजा। बाद में दूसरा प्रार्थना-पत्र डाक दारा भी भेजा, लेकिन फैक्ट्री की तरफ से कोई प्रतिउत्तर उन्हें नहीं दिया गया। दिनांक 17.1.1968 को श्री पुत्तु लाल को एक नोटिस दिनांकित 11-1-1968 मिली कि तीन माह तक अनुपस्थिति के कारण उसकी सरकारी सेवा की सदस्यता समाप्त हो चुकी है तथा इस अनुपस्थिति कारण यह माना गया है कि वह त्यागपत्र दे चुका है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में भी सेवक को कारण बताने का अवसर दिया जाना चाहिए कि क्यों न अवकाश से अधिक दिनों तक अनुपस्थित रहने के कारण उन्हें सेवा से हटा दिया जाय। यदि ऐसा अवसर न दिया गया हो तो सेवा-समाप्ति का आदेश अवैध एवं दूषित होगा।

अतः मूल नियम 18 एवं सहायक नियम 157-ए |4| के अधीन सरकारी सेवक की सेवा, उसकी अनुपस्थिति के कारण, स्वतः समाप्त नहीं होगी। इन नियमों के अधीन सेवा समाप्ति का आदेश करने से पूर्व उस सेवक को अपनी अनुपस्थिति का कारण बताने का अवसर प्रदान किया जायगा।

सरकारी सेवकों के सेवाकाल के संबंध में एक अतिमहत्वपूर्ण उपबंध सविधान के अनुच्छेद 310(1) में है कि, सरकारी सेवक, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त पद धारण करता है। उसे प्रसाद- पर्यन्तता का सिद्धान्त कहते हैं।